GST: FAQs Series 6

Levy of and Exemption from Tax….Continue



Q 21. Can composition tax be collected from customers?

Ans. No, the registered person under composition scheme is not permitted to collect tax. It means that a composition scheme supplier cannot issue a tax invoice.

Q 22. How to compute ‘aggregate turnover’ to determine eligibility for composition scheme?

Ans. The methodology to compute aggregate turnover is given in Section 2(6). Accordingly, ‘aggregate turnover’ means value of all outward supplies (taxable supplies+exempt supplies+exports + inter-state supplies) of a person having the same PAN and it excludes taxes levied under central tax (CGST), State tax (SGST), Union territory tax (UTGST), integrated tax(IGST) and compensation cess. Also, the value of inward supplies on which tax is payable under reverse charge is not taken into account for calculation of ‘aggregate turnover’.

Q 23. What are the penal consequences if a person opts for the composition scheme in violation of the conditions?

Ans. If a taxable person has paid tax under the composition scheme though he was not eligible for the scheme then the person would be liable to penalty and the provisions of section 73 or 74 shall be applicable for determination of tax and penalty.


Q 24. Does the GST Law empower the Government to exempt supplies from the levy of GST?

Ans. Yes. In the public interest, the Central or the State Government can exempt either wholly or partly, on the recommendations of the GST council, the supplies of goods or services or both from the levy of GST either absolutely or subject to conditions. Further the Government can exempt, under circumstances of an exceptional nature, by special order any goods or services or both. It has also been
provided in the SGST Act and UTGST Act that any exemption granted under CGST Act shall be deemed to be exemption under the said Act.

Q 25. When exemption from whole of tax collected on goods or services or both has been granted absolutely, can a person pay tax?

Ans. No, the person supplying exempted goods or services or both shall not collect the tax in excess of the effective rate.



Disclaimer:

This FAQ on GST compiled by NACEN and vetted by the Source Trainers is based on the CGST/SGST/UTGST/IGSTAct(s). This FAQ is for training and academic purposes only.

The information in this blogger is reproduced from FAQ on GST publised by CBEC updated on 31 March 2017 and is not intended to be treated as legal ad vice or opinion. For greater details, you are requested to refer to the respective CGST/SGST/UTGST/IGST Acts.

The FAQs refer to CGST and SGST Acts as CGST/SGST as CGST Act and SGST Act are identical in most of the provisions. CGST Act has been introduced in the Parliament. The SGST Acts will be passed by respective state legislatures. A few provisions may be specific to state and may not be in CGST Act.

आयकर (ज्ञान श्रृंखला-4): प्रकल्पित कराधान योजना(Presumptive taxation scheme)

आयकर (ज्ञान श्रृंखला-4): प्रकल्पित कराधान योजना(Presumptive taxation scheme) 
 
·         प्रकल्पित कराधान योजना के मायने क्या हैं?

​​आयकर अधिनियम के अनुसार, कारोबार में व्यस्त व्यक्ति को नियमित लेखजोखा की किताबें बनाये रखना आवश्यक है, और हिसाबकिताब का लेखपरिक्षण कराना भी आवश्यक है। छोटे करदाताओं को इस उकतानेवाले काम से राहत दिलाने के लिए, आयकर कानून ने धाराओं 44एडी और 44एर्इ के तहत, प्रकल्पित कराधान योजना तैयार की है। 
प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार करनेवाला व्यक्ति अपनी आय की घोषणा निर्धारित दर पर कर सकता है, जिसके बदले उसे हिसाब किताब की किताबें बनाये रखने की आवश्यकता नहीं होगी, और ही उसे हिसाब किताब के रजिस्टर को परीक्षण करने की आवश्यकता है।
लघु करदाताओं के लिए, आयकर कानून ने निम्नलिखित रूप से दो प्रकल्पित कराधीन योजनाएं तैयार की हैं:
1. धारा 44 एडी की प्रकल्पित कराधान योजना;
2. धारा 44 एर्इकी प्रकल्पित कराधान योजना;
·         44 एडी की प्रकल्पित कराधान योजना किसके लिए रूपांकित की गर्इ है ?

​​ धारा 44 एडी की प्रकल्पित कराधान योजना किसी भी व्यवसाय से जुड़े ( 44 एर्इमें उल्लिखित माल वाहनों को भाड़े पर देना वगैरह के व्यवसाय को छोड़कर) लघु करदाताओं की राहत के लिए रूपांकित की गर्इ है।)​
·         धारा 44 एडी की प्रकल्पित कराधान योजना का लाभ उठाने के लिए कौन योग्य है ?
धारा 44 एडी की प्रकल्पित कराधान योजना निम्नलिखित व्यक्तियों द्वारा अंगीकार की जा सकती है :
1. निवासी व्यक्ति;
2. निवासी अविभक्त परिवार;
3. निवासी साझेदारी कंपनी (सीमित उत्तरदायित्व साझेदारी कंपनी को छोड़कर);
दूसरे शब्दों में, यह योजना अनिवासी द्वारा या किसी और व्यक्ति, हिन्दू अविभक्त परिवार या साझेदारी कंपनी (सीमित उत्तरदायित्व साझेदारी कंपनी को छोड़कर) अंगीकार नहीं की जा सकती।
ये प्रावधान उस व्यक्ति द्वारा अंगीकार नहीं किये जा सकते, जिसने संबधित वर्ष में धारा 10/ 10एए/ 10बी/ 10बीए या धारा 80 एचएच से 80 आरआरबीतक के तहत छूट या राहत का दावा किया है।
·         कौन से व्यवसाय प्रकल्पित कराधान योजना के योग्य नहीं हैं ?

​​ 44 एडी के तहत प्रकल्पित कराधान योजना, निम्नलिखित व्यवसाय को छोड़कर किसी भी व्यवसाय में व्यस्त लघु करदाताओं की राहत या छूट के लिए रूपांकित की गर्इ है :
 धारा 44 एर्इ के तहत माल वाहनों को किराये पर देने का व्यवसाय;
वह व्यक्ति जो एजेंसी के व्यवसाय से जुड़ा है;
वह व्यक्ति जो कमीशन या दलाली के रूप में आय अर्जित करता है;
ऊपर चर्चित व्यवसाय के अलावा, वह व्यक्ति जो 44 एए(1)में उल्लिखित व्यवसाय से जुड़ा है, वह प्रकल्पित कराधान योजना के तहत योग्य नहीं है।
·         क्या धारा 44 एडी के तहत एक बीमा एजेंट प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार कर सकता है ?

​​एक व्यक्ति जो कमीशन या दलाली के रूप में आय अर्जित करता है, वह धारा 44 एडी के प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार नहीं कर सकता। बीमा एजंट कमीशन के द्वारा आय अर्जित करते हैं, इसलिए वे 44 एडीकी प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार नहीं कर सकते।
·         क्या धारा 44 एडी के तहत वह व्यक्ति प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार कर सकता है, जिसकी कुल बिक्री या सकल प्राप्तियां 1,00,00,000 रुपये है ?
​​ 44 एडी के तहत, प्रकल्पित कराधान योजना योग्य व्यक्तियों द्वारा अंगीकार की जा सकती है, अगर उसके व्यवसाय से उसकी कुल बिक्री या सकल प्राप्तियां 44 एबी में निर्धारित लेखजोखा की सीमा को पार नहीं करता (यानी कि1,00,00,000 रुपये।) दूसरे शब्दों में, अगर व्यवसाय की कुल बिक्री या सकल प्राप्तियां 1,00,00,000 रुपये की राशि लांघ जाती है, तो वह व्यक्ति 44 एडीके तहत, प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार नहीं कर सकता।
·         क्या धारा 44 एए(1) में निर्धारित व्यवसाय से जुड़ा व्यक्ति, धारा 44 एडी के तहत, प्रकल्पित कराधान योजना अंगीकार कर सकता है ?

धारा 44 एए(1) में निर्धारित किसी भी व्यवसाय से जुड़ा व्यक्ति, धारा 44 एडीके तहत प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार नहीं कर सकता।
·         आयकर कानून के सामान्य प्रावधानों के तहत, करयोग्य व्यावसायिक आय के परिकलन कैसे किया जाता है, यानी कि अगर †† डी की प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार नहीं करता ?

सामान्य रूप से, आयकर कानून के अनुसार, हर व्यक्ति की करयोग्य व्यावसायिक आय, निम्नलिखित रूप से परिकलित की जाती है:
विवरण
राशि
कुल बिक्री या व्यवसाय की सकल प्राप्तियां
——–
कम : आय अर्जित करने के लिए किया गया व्यय
——–
कुल व्यावसायिक कर योग्य आय
——–
ऊपर बताये गए तरीके से, करयोग्य व्यवसायिक आय को परिकलित करने के उद्येश से, कर डाटा को लेखजोखा की किताबें बनाये रखना आवश्यक है जिनमे दी गर्इ जानकारी के आधार पर, आय का परिकलन किया जायेगा।
·         करयोग्य व्यवसायिक आय का परिकलन कैसे किया जाता है, अगर एक व्यक्ति धारा 44 एडी के तहत प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार करना चाहता है?

​​अगर एक व्यक्ति 44 एडी के प्रावधान अंगीकार करना चाहता है, प्रकल्पित आधार पर आय परिकलित की जाती है, यानि कि/वर्ष के उपयुक्त व्यवसाय की कुल बिक्री या सकल प्राप्तियों का 8%
दूसरे शब्दों में, अगर एक व्यक्ति 44 एडीके प्रावधान अंगीकार करता है, तो आय का परिकलन एफ क्यू (यानी कि कुल बिक्री से व्यय घटाकर) में चर्चित सामान्य तरीके से नहीं किया जायेगा, पर कुल बिक्री के 8% की दर से किया जायेगा।
उच्च दर पर आय, यानी कि 8% से अधिक आय घोषित की जा सकती है अगर वास्तविक आय 8% से अधिक है।

·         धारा 44 एडी की प्रकल्पित कराधान योजना के अनुसार, करदाता की आय कुल बिक्री या सकल प्राप्तियों की 8% की दर पर परिकलित जायेगी। और 8% की आय में से क्या करदाता और अधिक छूट का दावा कर सकता है ?

​​आयकर कानून के सामान्य प्रावधानों के अनुसार, करयोग्य व्यवासिक आय, आयकर कानून अनुसार कटौती योग्य व्यय का निगमन करके, और उन कटौतियों को नामंज़ूर करने के बाद जो आयकर कानून के अनुसार कटौती योग्य नहीं हैं, उसके बाद आय परिकलित की जाएगी।
अगर एक व्यक्ति, धारा 44 एडी के तहत प्रकल्पित कराधान योजना को चुनता है, तो आयकर कानून के तहत प्रदान किये गए छूट/नामंजूरी के प्रावधान लागू नहीं होंगे, और 8% की प्रकल्पित दर पर परिकलित आय, प्रकल्पित कराधान योजना के तहत, व्यवसाय संबधी सुनिश्चित करयोग्य आय मानी जाएगी। दूसरे शब्दों में, 8% की दर पर परिकलित आय, आवृत किये हुए कारोबार की सुनिश्चित अंतिम आय होगी, और कोर्इ और व्यय लविकार या अस्वीकार नहीं किया जायेगा।
फिर भी, अगर करदाता एक साझेदार कंपनी है जो प्रकल्पित कराधान योजना को चुनती है, कुल बिक्री की Š% की दर से परिकलित आय में से, मेहनताना और साझेदारों को चुकता किये गए ब्याज के रूप में आगे की छूट का दावा किया जा सकता है (आयकर कानून के अनुसार परिकलित।)
धारा 44 एडीके अनुसार आय की संगणना करते समय, अवमूल्यन के रूप में अलग से छूट उपलब्ध नहीं होगी। फिर भी, ऐसे व्यवसाय में प्रयोग की जानेवाली किसी भी संपत्ति का मूल्य, जैसे कि अवमूल्यन का धारा 32, के अनुसार दावा किया गया है, और वास्तव में उसकी मंज़ूरी दी गर्इ है।
·         अगर एक व्यक्ति धारा 44 एडी के तहत प्रकल्पित कराधान योजना को चुनता है, तो धारा 44 एए के अनुसार लेखजोखा की किताबें बनाये रखना आवश्यक है?

​​ धारा 44 एए, व्यवसाय या पेशे से जुड़े व्यक्ति को लेखजोखा की किताबें बनाये रखने के कार्य में व्यवहार करता है। इसलिए, व्यवसाय/पेशे से जुड़े एक व्यक्ति को धारा 44 एए के अनुसार लेखजोखा की किताबें बनाये रखना आवश्यक है।
अगर एक व्यक्ति किसी व्यवसाय से जुड़ा है, और धारा 44 ऐडी की प्रकल्पित कराधान योजना चुनता है, तो धारा 44 एए के, लेखाजोखा की किताबें बनाये रखने के प्रावधान उसपर लागू नहीं होंगे। दूसरे शब्दों में, अगर एक व्यक्ति धारा 44 ऐडी के प्रावधान चुनता है, और अपनी आय कुल बिक्री की 8% की दर से घोषित करता है, तो उसे धारा 44 एईकी प्रकल्पित कराधान योजना के तहत आवृत किये गए कारोबार के संबध, धारा 44 ऐडी में दिए गए प्रावधानों के अनुसार उसे लेखजोखा की किताबें बनाये रखने की आवश्यकता नहीं है। लेखजोखा की किताबें बनाये रखने की राहत के अलावा, यह योजना कर दाता को लेखजोखा की किताबें के परीक्षण से भी छुटकारा मिल जायेगा।
·         अगर एक व्यक्ति धारा 44 एडी की प्रकल्पित कराधान योजना चुनता है, तो क्या उसे धारा 44 एडी के तहत आवृत किये गए व्यवसाय के संबध में अग्रिम कर चुकता करने की आवश्यकता होगी ?

धारा 44 एडी की प्रकल्पित कराधान योजना चुनने वाला व्यक्ति को, धारा 44 एडीके तहत आवृत किये गए व्यवसाय के संबध में अग्रिम कर भुगतान करने की आवश्यकता नहीं होगी।
·         अगर एक व्यक्ति 44 एडी की ओरकल्पित कराधान योजना नहीं चुनता है, और अपनी आय निचली दर पर घोषित करता है, तो ऐसे व्यक्ति पर किस प्रकार के प्रावधान लागू होंगे?

एक व्यक्ति अपनी आय निचली दर पर घोषित कर सकता है (8% से भी कम), फिर भी अगर वो ऐसा करता है और उसकी आय उस अधिकतम राशि को लांघ जाती है जो करयोग्य नहीं है, तो उसे धारा   के अनुसार, लेखजोखा की किताबें बनाये रखनी होंगी और उनका परिक्षण भी करना होगा।
·         धारा 44 एर्इ की प्रकल्पित कराधान योजना किसके लिए रूपांकित की गर्इ है ?

​​ धारा 44 एर्इकी योजना उन लघु करदाताओं को राहत प्रदान करने के लिए है, जो करदाता माल ढोहने और मालवाहनों को किराए पर देने के व्यवसाय जुड़े हैं।
·         धारा 44 एर्इ की प्रकल्पित कराधान योजना का लाभ उठाने के योग्य कौन है ? और 44 एर्इ की प्रकल्पित कराधान योजना का लाभ कौंस व्यवसाय उठा सकता है ?

धारा 44 एर्इ के प्रावधान हर व्यक्ति पर लागू होते हैं, (यानी कि व्यक्ति, हिन्दू अविभक्त परिवार, कंपनी वगैरह।)
धारा 44 एर्इकी प्रकल्पित कराधान योजना का लाभ उस व्यक्ति द्वारा उठाया जा सकता है जो माल वाहनों को किराये पर देने के व्यवसाय से जुड़ा है और जो वर्ष के किसी भी समय, å माल वाहनों से अधिक का मालिक नहीं है।
·         क्या वह व्यक्ति जिसके पास 10 से अधिक माल वाहन हैं, धारा 44 एर्इ की प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार कर सकता है ?

 धारा 44 ऐर्इकी कराधान योजना उस व्यक्ति द्वारा अंगीकार की जा सकती है, जो माल दोहने और माल वाहनों को भाड़े पर देने के है, और जिसके पास, वर्ष के किसी भी समय 10 से अधिक माल वाहन नहीं हैं।
इस योजना की महत्व की बात है कि पास, वर्ष के किसी भी समय, 10 से अधिक माल वाहनों के मालिक होने पर प्रतिबंध। इसीलिए अगर एक व्यक्ति, वर्ष के किसी भी समय पर 10 से अधिक माल वाहनों का मालिक होता है, तो वह इस योजना का लाभ नहीं उठा सकता।

·         अगर एक व्यक्ति धारा 44 एर्इ की प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार करता है, तो उसकी करयोग्य व्यवसायिक आय के परिकलन का क्या तरीका होगा?

​​​अगर एक व्यक्ति धारा 44 एर्इ की प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार करना चाहता है, तो उसकी आय का परिकलन अनुमानित आधार पर होगा। आय के परिकलन की दर भारी माल वाहनों और अन्य वाहनों के लिए अलग अलग होगी। दरें इस प्रकार हैं :
भारी माल वाहनों में, (*) आय का परिकलन 5,000 रुपये प्रति माह या उसके भाग की दर से होगा, जिस अवधि में, वर्ष के किसी भी समय माल वाहनों का मालिकाना करदाता के हाथों होगा
(*) भारी माल वाहन के मायने हैं बिना किसी माल के, कोर्इ भी माल वाहन, ट्रेक्टर, रोड रोलर जिसका वज़न 12,000 किलोग्राम से अधिक है।
किसी भी अन्य माल वाहन के मामले में, (यानी कि भारी माल वाहन के अलावा) आय का परिकलन 4,5000 रुपये प्रति माह या उसके हिस्से के लिए होगा, वर्ष की किसी भी अवधि में माल वाहन का मालिकाना करदाता के हाथ में होगा।
नोट : अगर वास्तविक आय अधिक है, तो प्रकल्पित दर, यानी क़ि 5,000 रुपये/4,500 रुपये , से अधिक है तो अधिक आय घोषित करनी होगी।
नोट : एक माह का भाग पूरे माह के रूप में माना जायेगा।
बेहतर समझ के लिए स्पष्टीकरण
श्री खुश माल ढोहने और माल वाहनों को भाड़े पर देने के कारोबार से जुड़े हैं। वर्ष2013-14 में उनके पास 9 माल वाहन थे, (5 भारी माल वाहन और 4 अन्य माल वाहन।) अगर वो धारा 44 एर्इ के प्रावधान अंगीकार करता है, तो माल ढोहने और माल वाहनों को भाड़े पर देने से अर्जित की हुर्इ उसकी कर योग्य आय क्या होगी ?
**
धारा 44 एर्इके अनुसार, भारी माल वाहनों के मामले में, आय का परिकलन 5,000 रुपये की दर प्रति माह या उसके भाग के लिए किया जायेगा, वर्ष की जिस अवधि में माल वाहनों का मालिकाना करदाता के हाथ में होगा अन्य माल वाहनों के मामले में (भारी माल वाहनों अलावा) आय का परिकलन 4,500 रुपये प्रतिमाह या उसके भाग की दर से होगा, वर्ष की जिस अवधि के दौरान माल वाहनों (भारी माल वाहन छोड़कर) का मालिकाना कर दाता के हाथ में होगा
मौजूदा हालात में, पूरे वर्ष में श्री खुश के पास 5 भारी माल वाहन और 4 अन्य माल वाहन थे, (भारी माल वाहनों के अलावा।) इसलिए उनकी आय का परिकलन निम्नलिखित रूप से किया जायेगा :
विवरण
रुपये
भारी माल वाहनों से अर्जित आय
प्रति भारी माल वाहन से प्रति माह अर्जित की गर्इ आय
5,000
भारी माल वाहनों की संख्या (×)
5
धारा 44 एर्इ के अनुसार 5 माल वाहनों से अर्जित आय
25,000
वर्ष में उन महीनों की संख्या जिनमे माल वाहनों पर मालिकाना अधिकार था (×)
12
धारा 44 एर्इ के प्रावधानों के अनुसार 5 भारी वाहनों से अर्जित कुल आय ()
3,00,000
अन्य माल वाहनों से अर्जित आय (भारी माल वाहनों केा छोड़कर)
प्रति माह प्रति वाहन से अर्जित आय (भारी माल वाहनों छोड़कर)
4,500
वाहनों की संख्या (×)
4
धारा 44 एर्इ के प्रावधानों के अनुसार 4 अन्य वाहनों (भारी माल वाहन छोड़कर) से अर्जित मासिक आय
18,000
वर्ष में उन महीनों की संख्या जिनमे माल वाहनों पर मालिकाना अधिकार था (×)
12
धारा 44 एर्इ के प्रावधानों के अनुसार 4 अन्य वाहनों से अर्जित कुल आय (भारी माल वाहनों को छोड़कर) ()
2,16,000
धारा 44 एर्इके प्रावधानों के अनुसार माल ढोहने, और माल वाहनों को  भाड़े पर देने से अर्जित आय (+)
5,16,000
·         धारा 44 एर्इ की प्रकल्पित कराधान योजना के अनुसार, एक करदाता की आय रुपये 4,500/रुपये 5,000 प्रति माह प्रति माल वाहन की दर से परिकलित की जायेगी, तो क्या ऐसे मामले में एक करदाता निर्धारित दर पर घोषित प्रकल्पित आय पर, और अधिक निगमन का दावा कर सकता है ?

​​आयकर कानून के सामन्य प्रावधानों के तहत, करयोग्य व्यावसायिक आय, व्यय के रूप में निगमन के बाद परिकलित की जायेगी, जो निगमन आयकर कानून के अनुसार कटौती योग्य हैं और उन व्ययों को अस्वीकार करने के बाद जो कटौतीयोग्य नहीं हैं।
अगर एक व्यक्ति धारा 44 एर्इ की प्रकल्पित कराधान योजना को चुनता है, तो आयकर कानून के अनुसार उसपर, स्वीकृति/अस्वीकृति के प्रावधान लागू नहीं होंगे, और आय का परिकलन प्रकल्पित दर के हिसाब से रुपये 4,500/रुपये 5,000 प्रति माह प्रति वाहन होगा, जो कि अंतिम (फ़ाइनल) आय मानी जायेगी। दूसरे शब्दों में, प्रति माह प्रति वाहन की आय रुपये 4,500/रुपये 5,000 की दर से, कारोबार की फ़ाइनल करयोग्य आय मानी जायेगी और किसी भी प्रकार के अन्य व्यय अनुमत नहीं होंगे।
तो भी, अगर कर दाता साझेदार कंपनी है, और वह प्रकल्पित कराधान योजना को चुनती है, आय का परिकलन रुपये 4,500/रुपये 5,000  प्रति माह प्रति माल वाहन की दर पर परिकलित किया जायेगा और आगे के निगमन का दावा मेहनताना और साझेदारों को दिए गए ब्याज के रूप में किया जा सकता है।
धारा 44 एर्इ के प्रावधानों के अनुसार, आय का परिकलन करते समय, अवमूल्यन के तौर पर अलग से निगमन अनुमत नहीं है, फिर भी किसी भी संपत्ति का लिखित मूल्य धारा 32के तहत अवमूल्यन का दावा किया गया है और वास्तव में अनुमत भी किया गया है।

·         अगर एक व्यक्ति धारा 44 एर्इ की प्रकल्पित कराधान योजना अंगीकार करता है, तो उसे धारा 44 एर्इ के तहत लेखजोखा की किताबें बनाये रखना ज़रूरी हैं ?

​​आयकर अधिनियम 1961 की धारा 44 एए में व्यवसाय/कारोबार से जुड़े व्यक्ति को लेखजोखा की किताबें बनाये रखने के संबध में काफी प्रावधान मौजूद हैं। इसलिए व्यवसाय/कारोबार से जुड़े एक व्यक्ति को धारा 44 एए के अनुसार लेखजोखा की किताबें बनाये रखना आवश्यक है।
अगर एक व्यक्ति धारा 44 एर्इ की प्रकल्पित कराधान योजना को चुनता है, तो उसे धारा 44 एए से संबधित लेखजोखा की किताबें बनाये रखने के प्रावधान लागू नहीं होंगे। दूसरे शब्दों में, अगर एक व्यक्ति धारा 44 एर्इ के प्रावधान अंगीकार करता है, और अपनी आय रुपये 4,500/रुपये 5,000  प्रति वाहन प्रति माह के हिसाब से घोषित करता है, तो उसे धारा 44 एर्इकी प्रकल्पित कराधान योजना के तहत आवृत व्यवसाय के संबध में, धारा 44 एए के तहत लेखाजोखा की किताबें बनाये रखने की आवश्यकता नहीं है। लेखाजोखा की किताबें बनाये रखने की राहत पाने के अलावा, यह योजना करदाता को लेखाजोखा की किताबों के अनिवार्य परीक्षण से भी छुटकारा दिलाएगा।
·         अगर एक व्यक्ति धारा 44 एर्इ की प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार करता है, तो क्या उसे धारा 44 एर्इ के तहत, आवृत व्यवसाय की आय के संबध में अग्रिम कर भुगतान करने की आवश्यकता होगी?

​​जो भी व्यक्ति धारा 44 एर्इ के तहत, प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार करता है, उसे अग्रिम कर के भुगतान के लिए कोर्इ राहत नहीं है। इसलिए वो अग्रिम कर भुगतान करने के लिए ज़िम्मेदार है, इसके बावजूद कि उसने धारा 44 एर्इके तहत प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार किया है।

·         अगर कोर्इ व्यक्ति धारा 44 एर्इ की प्रकल्पित कराधान योजना को अंगीकार नहीं करता, और अपनी आय निचली दर पर घोषित करता है, तो उसपर कौनसे प्रावधान लागू होंगे?

​​एक व्यक्ति अपनी आय निचली दर पर घोषित कर सकता है, (यानी कि रुपये 4,500/रुपये 5,000  प्रति वाहन, प्रति माह।). लेकिन वो अगर ऐसा करता है तो उसे धारा 44 एएके अनुसार, लेखजोखा की किताबें बनाये रखनी होंगी, और अपनी लेखजोखा की किताबों का परिक्षण भी कराना होगा।
 
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BIPUL KUMAR
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Mob: 9122050937

Ashtavakra Gita…Special instructions

ASHTAVAKRA  GITA

Special instructions

Ashtavakra said:

16.10

He who claims liberation as his own,  
as an attainment of a person,  
is neither enlightened nor a seeker,   
He suffers his own misery.

 16.11

Though Hara, Hari
or the lotus-born Brahma himself     
instruct you,    
until you know nothing    
you will never know Self.

Series continue 💐💐💐        

You are welcome for discussion Sunday 4 pm to 7pm, Friday 9 pm to 10 pm.(Mob. 9560084833)

GST: FAQs Series 5

Levy of and Exemption from Tax….Continue



Q 11. What will be the implications in case of receipt of supply from unregistered persons?

Ans. In case of receipt of supply from an unregistered person, the registered person who is receiving goods or services shall be liable to pay tax under reverse charge

mechanism.

Q 12. Can any person other than the supplier or recipient be liable to pay tax under GST?

Ans. Yes, the Central/State government can specify categories of services the tax on which shall be paid by the electronic commerce operator, if such services are supplied through it and all the provisions of the Act shall apply to such electronic commerce operator as if he is the person liable to pay tax in relation to supply of such services.

Q 13. What is the threshold for opting to pay tax under the composition scheme?

Ans. The threshold for composition scheme is Rs. 50 Lakhs of aggregate turnover in the preceding financial year. The benefit of composition scheme can be availed up to the turnover of Rs. 50 Lakhs in current financial year.

Q 14. What are the rates of tax for composition scheme?

Ans. There are different rates for different sectors. In normal cases of supplier of goods (i.e. traders), the composition rate is 0.5 % of the turnover in a State or
Union territory. If the person opting for composition scheme is manufacturer, then the rate is 1% of the turnover in a State or Union territory. In case of restaurant services, it is 2.5% of the turnover in a State or Union territory. These rates are under one Act, and same rate would be applicable in the other Act also. So, effectively, the composition rates (combined rate under CGST and SGST/UTGST) are 1%, 2% and 5% for normal supplier, manufacturer and restaurant service respectively.

Q 15. A person availing composition scheme during a financial year crosses the turnover of Rs.50 Lakhs during the course of the year i.e. say he crosses the turnover of Rs.50 Lakhs in December? Will he be allowed to pay tax under composition scheme for the remainder of the year i.e. till 31st March?

Ans. No. The option availed shall lapse from the day on which his aggregate turnover during the financial year exceeds Rs.50 Lakhs.

Q 16. Will a taxable person, having multiple registrations, be eligible to opt for composition scheme only for a few of registrat ions ?

Ans. All registered persons having the same Permanent Account Number (PAN) have to opt for composition scheme. If one registered person opts for normal scheme, others become ineligible for composition scheme.

Q 17. Can composition scheme be availed of by a manufacturer and a service supplier?

Ans. Yes, a manufacturer can opt for composition scheme generally. However, a manufacturer of goods, which would be notified on the recommendations of the GST Council, cannot opt for this scheme. This scheme is not available for services sector, except restaurants.

Q 18. Who are not eligible to opt for composition scheme?

Ans. Broadly, five categories of registered person are not eligible to opt for the composition scheme. These are:

(i) supplier of services other than supplier of restaurant service;
(ii) supplier of goods which are not taxable under the CGST Act/SGST Act/UTGST Act.
(iii) an inter-State supplier of goods;
(iv) person supplying goods through an electronic commerce operator;

(v) manufacturer of certain notified goods.


Q 19. Can the registered person under composition scheme claim input tax credit?

Ans. No, registered person under composition scheme is not eligible to claim input tax credit.

Q 20. Can the customer who buys from a registered person who is under the composition scheme claim composition tax as input tax credit?

Ans. No, customer who buys goods from registered person who is under composition scheme is not eligible for composition input tax credit because a composition scheme supplier cannot issue a tax invoice.



Disclaimer:

This FAQ on GST compiled by NACEN and vetted by the Source Trainers is based on the CGST/SGST/UTGST/IGSTAct(s). This FAQ is for training and academic purposes only.

The information in this blogger is reproduced from FAQ on GST publised by CBEC updated on 31 March 2017 and is not intended to be treated as legal ad vice or opinion. For greater details, you are requested to refer to the respective CGST/SGST/UTGST/IGST Acts.

The FAQs refer to CGST and SGST Acts as CGST/SGST as CGST Act and SGST Act are identical in most of the provisions. CGST Act has been introduced in the Parliament. The SGST Acts will be passed by respective state legislatures. A few provisions may be specific to state and may not be in CGST Act.

Quoting of Aadhaar number in Return of Income/PAN application form

As per section 139AA, Every person who is eligible to obtain Aadhaar number shall, on or after the 1st day of July, 2017, quote Aadhaar number in the return of income/ application form for allotment of permanent account number.

.Instruction for linking your aadhar no. on https://incometaxindiaefiling.gov.in for filing of Income Tax return for the AY 2017-18 and onwards:

1. Without Login on https://incometaxindiaefiling.gov.in
Enter PAN, Aadhaar No., Name as per Aadhaar, Captcha code to link your aadhaar no,
Note: 
i. Ensure Date of birth, Gender and Aadhaar Number is as per Aadhaar details
ii.If Date of Birth and Gender is fully matched and Name as per Aadhaar is not exactly matched then user has additionally provide Aadhar OTP to proceed with partial name match.
2. After Login on https://incometaxindiaefiling.gov.in

Login to e-Filing website: https://incometaxindiaefiling.gov.in with your login credentials 
If you had not attempted previously to link Aadhaar, then on login, a popup will appear to provide the Aadhaar number. Provide the Aadhaar in the given field, input the captcha image in the required field and click “Link Now” 
If you had attempted linking Aadhaar previously and the linking had failed, you may attempt to link once again by following these steps: Post login > Profile Settings > ‘Link Aadhaar> Enter your 12 Digit ‘Aadhaar’ Number > Enter the Captcha > Click on ‘Link Aadhaar’ to link with your PAN.

Extract of Section 139AA inserted by Finance Act, 2017, w.e.f. 1-4-2017 requiring quoting of Aadhaar number is given below for your reference: 

Quoting of Aadhaar number.

139AA. (1) Every person who is eligible to obtain Aadhaar number shall, on or after the 1st day of July, 2017, quote Aadhaar number—
(i)   in the application form for allotment of permanent account number;
(ii)   in the return of income:
Provided that where the person does not possess the Aadhaar Number, the Enrolment ID of Aadhaar application form issued to him at the time of enrolment shall be quoted in the application for permanent account number or, as the case may be, in the return of income furnished by him.
(2) Every person who has been allotted permanent account number as on the 1st day of July, 2017, and who is eligible to obtain Aadhaar number, shall intimate his Aadhaar number to such authority in such form and manner as may be prescribed, on or before a date to be notified by the Central Government in the Official Gazette:
Provided that in case of failure to intimate the Aadhaar number, the permanent account number allotted to the person shall be deemed to be invalid and the other provisions of this Act shall apply, as if the person had not applied for allotment of permanent account number.
(3) The provisions of this section shall not apply to such person or class or classes of persons or any State or part of any State, as may be notified by the Central Government in this behalf, in the Official Gazette.
Explanation.—For the purposes of this section, the expressions—
(i)   “Aadhaar number”, “Enrolment” and “resident” shall have the same meanings respectively assigned to them in clauses (a), (m) and (v)of section 2 of the Aadhaar (Targeted Delivery of Financial and other Subsidies, Benefits and Services) Act, 2016 (18 of 2016);
(ii)   “Enrolment ID” means a 28 digit Enrolment Identification Number issued to a resident at the time of enrolment. ]

आयकर (ज्ञान श्रृंखला-3):गृह संपत्ति से अर्जित आय



  • 1. क्या उप किरायेदारी से प्राप्त किराये की आय पर “गृह संपत्ति से आय” मद में कर लगाया जा सकता है? ​

  • “गृह संपत्ति से आय” मद में कर संपत्ति मालिक के हाथों में किराये की आय पर लगाया जाता है, मालिक के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को प्राप्त किराये की आय पर कर “गृह संपत्ति से आय” मद में नहीं लगायी जा सकती। इसलिए, एक किरायेदार द्वारा उप किरायेदारी से प्राप्त किराये की आय पर कर “गृह संपत्ति से आय” मद में नहीं लगाया जा सकता। ऐसी आय पर मामले के अनुसार “अन्य स्रोतों से आय” या व्यापार या पेशे से लाभ या आय मद में कर लगाया जा सकता है।

  • 2. एक दुकान से प्राप्त किराये की आय पर किस मद के तहत कर लगाया जा सकता है?

  • एक संपत्ति जो कोर्इ इमारत या उससे लगी हुयी भूमि हो और करदाता जिसका मालिक हो, से प्राप्त किराये की आय पर “गृह संपत्ति से आय” मद में कर लगाया जा सकता है। “गृह संपत्ति से आय” मद में कर लगाने के लिए संपत्ति का कोर्इ इमारत या उससे लगी हुयी भूमि होना चाहिए। क्योंकि दुकान एक भवन है इस लिए दुकान से प्राप्त किराये की आय पर “गृह संपत्ति से आय” मद में कर लगाया जायेगा।

  • 3. क्या किराये से आय उस व्यक्ति के हाथों कर हेतु वसूलनीय होगी जो संपत्ति का पंजीकृत मालिक नहीं हैं ?​​

  • ​​संपत्ति से किराए की आय संपत्ति के मालिक के हाथों ‘गृह संपत्ति से आय’ शीर्षक के तहत कर हेतु वसूलनीय होती हैं यदि किराया प्राप्त करने वाला व्यक्ति संपत्ति का मालिक नही हैं तो किराये की आय “गृह संपत्ति से आय” शीर्षक के अंतर्गत कर हेतु वसूलनीय नही होती (उदाहरण उप-भाडे़ द्वारा किरायेदार से प्राप्त किराया)। निम्नलिखित मामलों में एक व्यक्ति संपत्ति का पंजीकृत मालिक नही हो सकता लेकिन उसे सपंत्ति का मालिक (अर्थात् मालिक समझा जाना) के तौर पर समझा जाएगा तथा संपत्ति से किराए की आय उसके हाथों कर हेतु वसूलनीय होगी

    (1) यदि व्यक्ति बिना उचित विचार के अपने जीवनसाथी (अलग रहने के समझौते के संबंध में स्थानांतरण के तौर पर) अथवा अपने नाबालिग बालक (विवाहित पुत्री के तौर पर नहीं) अपना अथवा अपनी संपत्ति का स्थानांतरण करता हैं तो स्थानांतरण सपंत्ति के मालिक के तौर पर समझा जाएगा
    (2) अविभाज्य सपंत्ति धारक संपत्ति में सन्नहित संपत्ति के मालिक के तौर पर समझा जाता हैं
    (3) सहकारी-संस्था, कंपनी के सदस्य अथवा व्यक्तियों के अन्य संघ जिसके लिए एक भवन (अथवा उसका भाग) सोसाइटी, कंपनी अथवा संघ, जो भी स्थिति हो, की भवन निर्माण योजना के अंतर्गत आवंटित अथवा पट्टे पर दी जाती हैं, संपत्ति के मालिक के तौर पर समझी जाती हैं
    (4) संपत्ति अधिनियम के स्थानांतरण की धारा 53क की शर्तों को पूरा करके संपत्ति का धारण करने वाले व्यक्ति मालिक (यद्यपि वह पंजीकृत मालिक नही हो सकता) के तौर पर समझा जाएगा
    (क) समझौता लिखित में होना चाहिए
    (ख) क्रय प्रतिफल का भुगतान किया हो अथवा खरीददार भुगतान करने का इच्छुक हैं
    (ग) खरीददार समझौते के अनुसार संपत्ति का अधिग्रहण किया हो
    (5) 12 वर्षों से अधिक की अवधि के लिए संपत्ति के पट्टेदारी की स्थिति में (चाहे मूल रूप से निश्चित हो अथवा विस्तारण के लिए प्रावधान मौजूद हो), पट्टेदारी सपंत्ति के मालिक के तौर पर समझी जाएगी। हालांकि महीने दर महीने से पट्टेदारी के रूप में अथवा कम से कम एक वर्ष वर्ष की अवधि के लिए किसी अधिकार के रूप में इस प्रावधान के अंतर्गत नहीं आते


  • 4. किराये या माल की बिक्री से अर्जित, शीर्ष अधिकार के तहत व्यापार से संबंधित आय गृह संपत्ति से आय “‘माना जाता है?

  • ​एक संपत्ति से प्राप्त किराये की आय पर “गृह संपत्ति से आय” मद में कर संपत्ति के मालिक के हाथों में गृह संपत्ति से प्राप्त किराये की आय पर लगाया जाता है। यदि किराया प्राप्त करने वाला व्यक्ति संपत्ति का मालिक नहीं है, तो प्राप्त किराये की आय पर “गृह संपत्ति से आय” मद में कर नहीं लगाया जा सकता (जैसे किरायेदार द्वारा उप किरायेदारी से प्राप्त किराया). निम्नलिखित मामलों में एक व्यक्ति, यद्यपि संपत्ति का पंजीकृत मालिक नहीं भी हो सकता है लेकिन वह मालिक के रूप में माना जाएगा (अर्थात, मालिक की तरह समझा जायेगा) और संपत्ति से उसके हाथ में प्राप्त किराये की आय पर कर लगाया जायेगा:
    (1) एक व्यक्ति अपनी संपत्ति का अपने पति या पत्नी को हस्तांतरण करता है (एक दूसरे से अलग रहने के समझौते के रूप में हस्तांतरण नहीं) या यह हस्तांतरण अपने नाबालिग बच्चों (अविवाहित पुत्रियों) को बिना किसी पर्याप्त प्रतिफल के करता है तो अंतरणकर्ता व्यक्ति संपत्ति के मालिक के रूप में माना जाएगा।
    (2) अविभाजित जायदाद का धारक जायदाद में शामिल संपत्ति के मालिक के रूप में समझा जाता है।
    (3) सहकारी समिति, कंपनी या व्यक्तियों के अन्य संघों के एक सदस्य को, जिसके अधीन एक इमारत (या इसका एक भाग) समिति, कंपनी या संघ, जैसा भी मामला हो के गृह निर्माण योजना के तहत आवंटित या किराए पर दी गयी है, संपत्ति के समझा मालिक के रूप में व्यवहार किया जाता है।
    (4) एक व्यक्ति जो संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम के धारा 53क की शर्तों को पूरा करता हो संपत्ति के मालिक के रूप में समझा जायेगा (जबकि वह संपत्ति का पंजीकृत मालिक नहीं भी हो सकता है)। उक्त अधिनियम के धारा 53क​ निम्नलिखित शर्तों का प्रावधान करता है:
    (क) एक लिखित समझौता मौजूद होना चाहिए।
    (ख) खरीद मूल्य का भुगतान किया गया है या खरीददार यह भुगतान करने को तैयार हो।
    (ग) खरीदार ने समझौते का पालन करते हुए संपत्ति को अपने अधिकार में ले लिया हो।
    (5) एक संपत्ति के 12 साल से अधिक की एक अवधि के पट्टे के मामले में (मूल रूप से तय हो या विस्तार के लिए प्रावधान मौजूद हों), पट्टेदार संपत्ति का मालिक माना जाता है। हालांकि, मासिक पट्टे या एक वर्ष से कम अवधि के पट्टों के जरिये प्राप्त किसी भी अधिकार के प्रावधान इस में शामिल नहीं हैं।

  • 5.समग्र किराया क्या है? जब समग्र किराया इमारत को अन्य परिसंपत्तियों के साथ किराये पर देने से संबंधित हो​

  • ​समग्र किराए में भवन का किराया और अन्य परिसंपत्तियों या सुविधाओं के किराए भी शामिल होते हैं। समग्र किराए का कर उपचार निम्नानुसार है: –
    (क) एक ऐसे मामले में, जहां इमारत को किराये पर देना और अन्य संपत्ति को किराये पर देना अलग नहीं किया जा सकता (यानी दोनों किरायेदारियां एक दूसरे से जुडी हुयी हैं और अलग नहीं की जा सकती जैसे सुसज्जित थिएटर का भाड़ा), पूरे किराये (यानी समग्र किराया) पर मामले के अनुसार “व्यवसाय और पेशे का लाभ और मुनाफा” या “अन्य स्रोतों से आय” मद के तहत कर वसूल किया जायेगा। “गृह संपत्ति से आय” मद के तहत कोर्इ कर नहीं लिया जायेगा।
    (ख) एक मामले जहां, इमारत को किराये पर देना और अन्य संपत्ति को किराये पर देना अलग अलग किया जा सकता हो (अर्थात, दोनों किरायेदारियां एक दूसरे से अलग हैं, जैसे आवासीय बंगले के साथ फ्रिज भी भाड़े पर देना), में इमारत के किराये पर “गृह संपत्ति से आय” मद के तहत, और अन्य परिसंपत्तियों से प्राप्त किराये पर मामले के अनुसार “व्यवसाय और पेशे का लाभ और मुनाफा” या “अन्य स्रोतों से आय” मद के तहत कर वसूल किया जायेगा। यह नियम तब भी लागू होता है जब भले ही मालिक दोनों किरायेदारियों के लिए समग्र किराया प्राप्त करता है। दूसरे शब्दों में, ऐसे एक मामले में, समग्र किराये को इमारत के किराये और अन्य परिसंपत्तियों के किराये में आवंटित किया जाता है।

  • 6. जब समग्र किराया इमारत को सेवाओं के शुल्क के साथ किराये पर देने से संबंधित हो तो समग्र किराए का कर उपचार क्या है?​

  • ऐसे एक मामले में, जब समग्र किराये में, इमारत के किराये के साथ विभिन्न सेवाओं के शुल्क (जैसे लिफ्ट, चौकीदार, पानी की आपूर्ति आदि), इस स्थिति में, समग्र किराये का बटवारा कर दिया जाता है और संपत्ति के उपयोग के किराये की राशि पर “गृह संपत्ति से आय” मद के तहत, और विभिन्न सेवाओं के प्रभार पर मामले के अनुसार “व्यवसाय और पेशे का लाभ और मुनाफा” या “अन्य स्रोतों से आय” (जो भी स्थिति हो) मद के तहत कर वसूल किया जायेगा।

  • 7. पूरे साल किराये पर रहने वाली एक संपत्ति से आय की गणना कैसे करते हैं?

  • ​किराये पर दी गयी संपत्ति से “गृह संपत्ति से आय” मद के तहत, देय कर की गणना करने के मामले में आय की निम्नलिखित तरीके से गणना की जाती है:
    विवरण राशि
    सकल वार्षिक मूल्य XXXX
    घटायें – वर्ष के दौरान नगर करों का भुगतान XXXX
    शुद्ध वार्षिक मूल्य (एनएवी) XXXX
    घटायें – धारा 24 के तहत कटौती
    ➢ धारा 24 (क) के तहत एनएवी के 30% पर कटौती (XXXX)
    ➢ धारा 24 (ख)​ के तहत उधार पूंजी पर ब्याज के खाते में कटौती (XXXX)
    गृह संपत्ति से आय XXXX

  • 8. पूरे साल भर किराये पर दी गयी एक संपत्ति के सकल वार्षिक मूल्य की गणना कैसे की जाती है?

  • पूरे साल भर किराये पर दी गयी एक संपत्ति का सकल वार्षिक मूल्य निम्नलिखित तरीके से निर्धारित किया जाता है:
    चरण 1: संपत्ति के उचित संभावित किराये की गणना करें। (विवरण के लिए उचित संभावित किराये की गणना पर पूछे जाने वाले प्रश्न का संदर्भ लें)।
    चरण 2: संपत्ति के वास्तविक किराये की गणना करें। (विवरण के लिए वास्तविक किराए की गणना पर पूछे जाने वाले प्रश्न का संदर्भ लें)।
    चरण 3: सकल वार्षिक मूल्य की गणना करें। (सकल वार्षिक मूल्य चरण 1 या चरण 2 पर गणना की गयी राशि से अधिक होगा)।

  • 9. पूरे साल भर किराये पर दी गयी एक संपत्ति के सकल वार्षिक मूल्य की गणना करते समय उचित संभावित किराये की गणना कैसे की जाती है? ​

  • उचित संभावित किराया निम्नलिखित से अधिक होता है:
     ➢  संपत्ति का नगर मूल्य (नोट 1); या
     ➢  संपत्ति का उचित किराया (नोट 2)।
    यदि एक संपत्ति किराया नियंत्रण कानून के तहत आती है, तो उचित संभावित किराया मानक किराए से अधिक नहीं हो सकता (नोट 3)।
    नोट 1: नगर मूल्य का अर्थ
    नगर निगम के करों के संग्रह के लिए, स्थानीय अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र में सभी भवनों का आवधिक सर्वेक्षण करते हैं। एक संपत्ति के संबंध में, नगर निगम के अधिकारियों द्वारा निर्धारित इस तरह का मूल्य संपत्ति का नगर मूल्य कहा जाता है।
    नोट 2:  उचित किराये का अर्थ
    यह वह उचित संभावित किराया है जो संपत्ति को प्राप्त हो सकता है। यह उसी या इसी तरह के इलाके में स्थित एक समान संपत्ति के प्राप्त किराए के आधार पर निर्धारित किया जा सकता है।
    नोट 3:  मानक किराये का अर्थ
    यह वह अधिकतम किराया है जो एक व्यक्ति कानूनी रूप से किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत अपने किरायेदार से प्राप्त कर सकता है। मानक किराया केवल किराया नियंत्रण कानून के तहत शामिल संपत्तियों के मामले में लागू होता है।
    उदाहरण
    निम्नलिखित जानकारी से प्रत्येक संपत्ति के उचित संभावित किराये की गणना करें:
    विवरण संपत्ति क (रु.) संपत्ति ख (रु.) संपत्ति ग (रु.)
    नगर मूल्य 8,48,484 8,48,484 8,48,484
    उचित किराया 2,52,252 2,52,252 2,52,252
    मानक किराया लागू नहीं 84252 9,84,000
    **
    उचित संभावित किराया निम्न में से अधिक होगा:
     ➢  संपत्ति का नगर मूल्य; या
     ➢  संपत्ति का उचित किराया।
    किराया नियंत्रण कानून के तहत शामिल एक संपत्ति के मामले में, उचित संभावित किराया संपत्ति का मानक किराये के अधीन नगर मूल्य या उचित किराये से अधिक होगा। प्रत्येक संपत्ति के मामले में इसकी गणना इस प्रकार की जायगी:
    संपत्ति क (रु.) संपत्ति ख (रु.) संपत्ति ग (रु.)
    उचित संभावित किराया 8,48,484 रुपए हो जाएगा। (नगर मूल्य और उचित किराये से अधिक है)। उचित संभावित किराया 84,252 रुपए हो जाएगा। (नगर मूल्य और उचित किराये से अधिक लेकिन मानक किराये तक प्रतिबंधित है)। उचित संभावित किराया 8,48,484 रुपए हो जाएगा जो नगर मूल्य और उचित किराये से अधिक लेकिन मानक किराये तक प्रतिबंधित है। (मानक किराया अधिक है और इसलिए मानक किराया का प्रतिबंध इस मामले में लागू नहीं होगा)।

     

  • 10.एक संपत्ति जो वर्ष भर किराये पर दी गयी हो के सकल वार्षिक मूल्य की गणना करते समय वास्तविक किराए की गणना कैसे की जाती है? ​

  • वास्तविक किराया का मतलब है वह किराया जिसके लिए संपत्ति वर्ष के दौरान किराए पर दी गयी है। वास्तविक किराए की गणना करते समय, रिक्ति अवधि से संबंधित किराए की कटौती नहीं की जाती है। हालांकि, अगर इस संबंध में निर्दिष्ट शर्तें पूरी हो रही हैं तो अप्राप्त किराए (*) की वास्तविक किराए से कटौती की जाती है।
    (*) अप्राप्त किराया संपत्ति का वह किराया होता है जो संपत्ति का मालिक किरायेदार से वसूल नहीं कर सकता यानी, किरायेदार द्वारा भुगतान नहीं किया गया किराया। अगर निम्नलिखित शर्तें पूरी हो रही हैं तो वर्ष के वास्तविक किराये में से अप्राप्त किराये की कटौती की जाती है;
     ➢  किरायेदारी यथार्थ है।
     ➢  दोषी किरायेदार, संपत्ति खाली गया है या उसे संपत्ति खाली करने के लिए मजबूर करने का कदम उठा लिया गया है।
     ➢  दोषी किरायेदार के कब्जे में करदाता की कोर्इ अन्य संपत्ति नहीं है।
     ➢  करदाता ने इस तरह की राशि की वसूली के लिए कानूनी कार्यवाही सहित सभी कदम उठाए हैं, या उसने आकलन अधिकारी को संतुष्ट कर दिया है कि कानूनी कार्यवाही बेकार होगी।
    उदाहरण
    श्री राज एक बंगले का मालिक है। वर्ष 2015-16 के दौरान बंगले को श्री कुमार को 84,000 रुपये मासिक किराए पर दिया गया है। आंतरिक विवाद के कारण, श्री कुमार ने मार्च 2016 के महीने के किराए का भुगतान नहीं किया था। संपत्ति के सकल वार्षिक मूल्य की गणना के लिए इस्तेमाल की जाने वाली वास्तविक किराए की राशि क्या होगी?
    **
    2016 के मार्च महीने का किराया प्राप्त नहीं किया गया है और, इसलिए, अप्राप्त किराया 84,000 रुपए होगा।
    संपत्ति के सकल वार्षिक मूल्य की गणना करते समय, वास्तविक किराये में से 84,000 रुपए अप्राप्त किराये की कटौती की जाएगी। इस प्रकार, सकल वार्षिक मूल्य की गणना करते समय वास्तविक किराया 9,24,000 रुपए (10,08,000 रुपये – 84,000 रुपये अप्राप्त किराया) माना जाएगा। अगर इस संबंध में चर्चा की गयी सभी शर्तें पूरी की गयी हैं तो 84,000 रुपये अप्राप्त किराया वास्तविक किराये में से काट लिया जाएगा।
    अगर इस संबंध में निर्दिष्ट की गयी सभी शर्तें पूरी नहीं की गयी हैं तो सकल वार्षिक मूल्य की गणना करते समय वास्तविक किराया 10,08,000 रुपये लिया जाएगा। (यानी, 84,000 रुपये का अप्राप्त किराया घटाये बिना पूरे साल का किराया)।

  • 11. पूरे साल भर किराये पर दी गयी एक संपत्ति के सकल वार्षिक मूल्य की गणना कैसे की जाती है? ​

  • पूरे साल भर किराये पर दी गयी एक संपत्ति का सकल वार्षिक मूल्य को निर्धारित करने के तरीके की चर्चा पहले की जा चुकी है, इसलिए, इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए यहाँ हम एक उदाहरण की चर्चा करेंगे।
    उदाहरण
    श्री राजा द्वारा प्रदान उसके द्वारा किराए पर दी गयी 3 संपत्तियों के संबंध में निम्नलिखित जानकारी से सभी संपत्तियों के सकल वार्षिक मूल्य की गणना करें।
    विवरण संपत्ति क (रुपये) संपत्ति ख (रुपये) संपत्ति ग (रुपये)
    नगर मूल्य 8,48,484 8,48,484 2,52,252
    उचित किराया 2,52,252 2,52,252 8,48,484
    मानक किराया लागू नहीं 84,252 9,84,000
    पूरे वर्ष का वास्तविक किराया 9,60,000 60,000 9,60,000
    अप्राप्त किराया (*) 1,60,000 शून्य 80,000
    (*) अप्राप्त किराये की कटौती के लिए निर्दिष्ट सभी शर्तें पूरी हैं।
    **
    सकल वार्षिक मूल्य की गणना निम्नानुसार की जाएगी:
    चरण 1: संपत्ति के उचित संभावित किराये की गणना।
    चरण 2: संपत्ति के वास्तविक किराये की गणना।
    चरण 3: सकल वार्षिक मूल्य की गणना।
    इन चरणों के आधार पर गणना निम्नानुसार की जाएगी:
    विवरण संपत्ति क (रुपये) संपत्ति ख (रुपये) संपत्ति ग (रुपये)
    चरण 1 पर राशि (नोट 1) 8,48,484 84,252 8,48,484
    चरण 2 पर राशि (नोट 2) 8,00,000 60,000 8,80,000
    चरण 3 में राशि, यानी, सकल वार्षिक मूल्य (नोट 3) 8,48,484 84,252 8,80,000
    नोट 1: चरण 1 पर राशि (अर्थात उचित संभावित किराया) नगर मूल्य या उचित किराये से अधिक है (मानक किराए के अधीन)।
    नोट 2: चरण 2 पर राशि अप्राप्त किराए को घटाने के बाद प्राप्त वास्तविक किराए की राशि है। अर्थात संपत्ति क के मामले में 8,00,000 रुपये (9,60,000 रुपये – 1,60,000 रुपये), संपत्ति ख के मामले में 60,000 रुपये, और संपत्ति ग के मामले में 8,80,000 रुपये (9,60,000 रुपये – 80,000 रुपये)।
    नोट 3: सकल वार्षिक मूल्य चरण 1 या चरण 2 की राशि से अधिक होगा।

  • 12.किराये पर दी गयी एक ऐसी संपत्ति के मामले में जो पूरे साल भर के दौरान कुछ समय तक खाली रही हो, के सकल वार्षिक मूल्य की गणना कैसे की जाती है? 

  • जहां संपत्ति या संपत्ति का कोर्इ भी भाग किराये पर दिया जाता है और पिछले पूरे वर्ष के दौरान या उसके किसी भी भाग के दौरान खाली था और ऐसी रिक्ति के कारण मालिक द्वारा प्राप्त या प्राप्य तत्संबंधी वास्तविक किराया उस संपत्ति के उचित संभावित किराये से कम है, इसलि​ए प्राप्त या प्राप्य (खाली समय के कम किराये के रूप में) संपत्ति के सकल वार्षिक मूल्य से कम होने का विचार किया जाएगा।
  • 13. किराये पर दी गयी संपत्ति के मामले में “गृह संपत्ति से आय” मद में कर के दायरे में आने वाली आय की गणना करते समय सकल वार्षिक मूल्य से खर्च की कटौती क्या होगी?

  • ​​किराये पर दी गयी संपत्ति के मामले में “गृह संपत्ति से आय” मद में कर के दायरे में आने वाली आय की गणना करते समय केवल निम्न मदों को ही सकल वार्षिक मूल्य से कटौती के रूप में दावा किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, निम्नलिखित खर्चों के आलावा करदाता द्वारा किए गए अन्य किसी भी खर्च की कटौती का दावा नहीं किया जा सकता है:
     ➢  वर्ष (*) के दौरान करदाता द्वारा भुगतान किये गए नगर निगम करों के खाते में कटौती।
     ➢  धारा 24 (क) के तहत शुद्ध वार्षिक मूल्य के 30% की दर से कटौती।
     ➢  धारा 24 (ख)​ के तहत संपत्ति की खरीद, निर्माण, मरम्मत, नवीनीकरण या पुनर्निर्माण के प्रयोजन के लिए उधार ली गर्इ पूंजी पर ब्याज के खाते में कटौती।
    (*) वर्ष के दौरान केवल स्वामी द्वारा भुगतान किये गए नगर निगम करों की कटौती की जा सकती है, इसलिए, नगर निगम के कर जो देय हैं पर जिनका वर्ष के दौरान भुगतान नहीं किया गया है या जिनका वहन किरायेदार द्वारा किया जा रहा हो की कटौती नहीं की जा सकती है।

  • 14. गृह संपत्ति से आय की गणना करते समय दोस्तों और रिश्तेदारों से लिये गए ऋण पर ब्याज के भुगतान की कटौती का दावा किया जा सकता है?

  • हाँ, अगर ऋण घर के खरीद, निर्माण, मरम्मत, नवीनीकरण या पुनर्निर्माण के लिए लिया जाता है। अगर ऋण व्यक्तिगत या अन्य प्रयोजनों के लिए लिया जाता है तो फिर इस तरह के ऋण पर ब्याज की कटौती का दावा नहीं किया जा सकता है।

  • 15. किराये पर दी गयी संपत्ति के मामले में “गृह संपत्ति से आय” मद के तहत कर के दायरे में आने वाली आय की गणना करते समय आवास ऋण पर कितने ब्याज की कटौती का दावा किया जा सकता है?

  • ​किराये पर दी गयी संपत्ति के मामले में “गृह संपत्ति से आय” मद के तहत कर के दायरे में आने वाली आय की गणना करते समय करदाता संपत्ति के खरीद, निर्माण, मरम्मत, नवीनीकरण या पुनर्निर्माण के उद्देश्य से लिए गए ऋण पर ब्याज के खाते में धारा 24 (ख) के तहत कटौती का दावा कर सकते हैं।
    किराये पर दी गयी संपत्ति के मामले में धारा 24 (ख)​ के तहत कटौती का दावा करने के लिए ब्याज की मात्रा की कोर्इ सीमा नहीं है। हालांकि, एक स्वयं के कब्जे में होने वाली संपत्ति के मामले में, मामले के अनुसार सीमा 2,00,000 रुपये या 30,000 रुपये हो सकती है (बाद में पूछे जाने वाले प्रश्न में इस पर चर्चा की जायेगी)।

  • 16. पूर्व निर्माण अवधि क्या है?

  • ​किराये पर दी गयी संपत्ति के मामले में “गृह संपत्ति से आय” मद के तहत कर के दायरे में आने वाली आय की गणना करते समय करदाता संपत्ति के खरीद, निर्माण, मरम्मत, नवीनीकरण या पुनर्निर्माण के उद्देश्य से लिए गए ऋण पर ब्याज के खाते में धारा 24 (ख) के तहत कटौती का दावा कर सकते हैं।
    ब्याज के खाते में कटौती को दो रूपों में वर्गीकृत किया जाता है, अर्थात, पूर्व निर्माण अवधि से संबंधित ब्याज और निर्माण के बाद की अवधि से संबंधित ब्याज।
    निर्माण के बाद की अवधि से संबंधित ब्याज प्रासंगिक वर्ष (यानी, जिस वर्ष के लिए आय गणना की जा रही है) से संबंधित ब्याज है।
    पूर्व निर्माण अवधि वह अवधि है जो ऋण के उधार लेने के तिथि से शुरू और निम्न में से पहले पर समाप्त होता है:
     ➢  ऋण की अदायगी की तिथि; या
     ➢  संपत्ति के निर्माण / अधिग्रहण के पूरा होने की तारीख से तुरंत पहले पड़ने वाले 31 मार्च
    पूर्व निर्माण अवधि से संबंधित ब्याज की उस वर्ष से शुरू हो कर जिस वर्ष में गृह संपत्ति का अधिग्रहण या निर्माण किया है पांच समान वार्षिक किश्तों में कटौती की अनुमति दी गयी है। इस प्रकार, ब्याज के खाते में धारा 24 (बी)​ के तहत करदाता के लिए उपलब्ध कुल कटौती, पूर्व निर्माण अवधि (यदि हो तो) से संबंधित ब्याज का 1/5 वां भाग निर्माण अवधि के बाद (यदि हो तो) से संबंधित ब्याज होगा।

  • 17. ​मै और मेरा जीवनसाथी संयुक्त रूप से एक घर के मालिक हैं जिसमें हम दोनों ने स्वतंत्र स्रोतों से समान राशि का निवेश किया है। क्या किराए से प्राप्त आय को हम दोनों के बीच विभाजित किया जा सकता है और व्यक्तिगत रूप से कर लगाया जा सकता है?

  • ​​​हाँ, यदि प्रत्येक सह स्वामी की हिस्सेदारी निश्चयात्मक है।​

  • 18. स्व-अधिकृत संपत्ति क्या है?

  • एक स्व-अधिकृत संपत्ति का मतलब एक ऐसी संपत्ति से है जो पूरे वर्ष करदाता द्वारा अपने निवास के लिए उसके कब्जे में हो। (अगले अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न को भी देखें)।
  • 19. स्व-अधिकृत संपत्ति से आय की गणना कैसे की जाती है?

  • ​​एक स्व-अधिकृत संपत्ति का मतलब एक ऐसी संपत्ति है जो करदाता द्वारा अपने निवास के लिए पूरे वर्ष भर अपने कब्जे में रखा गया हो। एक स्व-अधिकृत संपत्ति के मामले में “गृह संपत्ति से आय” मद के तहत कर देय आय की गणना का तरीका निम्नलिखित है:
    विवरण राशि
    सकल वार्षिक मूल्य शून्य
    वर्ष के दौरान भुगतान किये गए नगर करों को घटायें शून्य
    शुद्ध वार्षिक मूल्य (एनएवी) शून्य
    धारा 24 के तहत कटौती घटायें
    धारा 24 (क) के तहत कटौती एनएवी का 30% की दर से शून्य
    धारा 24 (ख)​ के तहत कटौती उधार पूंजी पर ब्याज के खाते में (XXXX)
    गृह संपत्ति से आय XXXX
    ऊपर की गणना में यह देखा जा सकता है कि एक स्व-अधिकृत संपत्ति के मामले में “गृह संपत्ति से आय” या तो शून्य (अगर आवास ऋण पर कोर्इ ब्याज नहीं है) या आवास ऋण पर ब्याज की हद तक नकारात्मक (यानी, हानि) हो जाती है। एक स्व-अधिकृत संपत्ति के मामले में आवास ऋण पर ब्याज के संबंध में कटौती 2,00,000 रुपये या 30,000 रुपये जैसा भी मामला हो, से अधिक नहीं हो सकता है। (इस पर बाद में चर्चा की जायेगी)

  • 20.क्या एक संपत्ति जिसका करदाता अपने निवास के लिए उपयोग नहीं की जा रही है को एक स्व-अधिकृत संपत्ति के रूप में व्यवहार किया जा सकता है?

  • ​​​​एक स्व-अधिकृत संपत्ति का मतलब एक ऐसी संपत्ति से है जो पूरे वर्ष करदाता द्वारा अपने निवास के लिए उसके कब्जे में हो। इस प्रकार, जिस संपत्ति का मालिक अपने निवास के लिए अपने कब्जे में नहीं रखता उस संपत्ति को स्व-अधिकृत संपत्ति के रूप में नहीं माना जा सकता है। हालांकि, इस नियम का एक अपवाद भी है। अगर निम्नलिखित शर्तें पूरी हो रही हों तो फिर संपत्ति को स्व-अधिकृत माना जायेगा और संपत्ति का वार्षिक मूल्य “शून्य” हो जाएगा, भले ही संपत्ति मालिक के अपने निवास के लिए वर्ष भर उसके कब्जे में नहीं रहा हो:
     (क)  करदाता एक संपत्ति का मालिक है;
     (ख)  ऐसी संपत्ति पर वास्तव में उसके द्वारा कब्जा अपने रोजगार, व्यापार या पेशे जो किसी अन्य जगह पर चल रहा हो के कारण नहीं किया जा सकता और वह उस अन्य स्थान पर रहते हों जिसके वे मालिक नहीं है।
     (ग)  ऊपर (क) में वर्णित संपत्ति (या उसका कोर्इ भाग) वर्ष के दौरान किसी भी समय किराये पर नहीं दी गयी हो।
     (घ)​  ऐसी संपत्ति से कोर्इ अन्य लाभ न प्राप्त हो रहा हो।

  • 21. “गृह संपत्ति से आय” मद में किस आय पर कर लगाया जा सकता है? ​

  • ​एक संपत्ति जो कोर्इ इमारत या उससे लगी हुयी भूमि हो और करदाता जिसका मालिक हो, से प्राप्त किराये की आय पर “गृह संपत्ति से आय” मद में कर लगाया जा सकता है।

  • 22. अगर एक व्यक्ति अपने निवास के लिए एक से अधिक संपत्ति को अधिकृत करता है तो कर निहितार्थ क्या होगा? क्या वह सभी संपत्तियों को स्व-अधिकृत संपत्ति (एसओपी) के रूप में ले सकते हैं और सकल वार्षिक मूल्य (जीएवी) को शून्य मान सकते हैं?

  • एसओपी लाभ (यानी, संपत्ति को एसओपी के रूप में मानना और जीएवी को शून्य के रूप में दावा करना) अपने निवास के लिए उपयोग किये गए मालिक के कब्जे में स्थित केवल एक संपत्ति के संबंध में ही उपलब्ध है।
    अगर एक व्यक्ति अपने निवास के लिए एक से अधिक संपत्ति का उपयोग करता है, तो एसओपी लाभ उसके द्वारा चयनित एक संपत्ति के संबंध में ही प्रदान किया जाएगा और अन्य संपत्ति/संपत्तियों को “किराये पर दिया गया माना जाएगा”। किराये पर दी गयी मानी जा रही संपत्ति के संबंध में किराये पर “दी गयी” संपत्ति के संबंध में पहले की गयी चर्चा के अनुसार ही आय की गणना की जायेगी।

  • 23. मैं दो घरों का मालिक हूँ। पहला एक फार्म हाउस है जहाँ मैं सप्ताहांत पर जाता हूँ और दूसरा शहर में है जिसका मैं काम करने के दिनों में पूरे हफ्ते उपयोग करता हूँ। क्या इन दोनों घरों को स्व-अधिकृत संपत्ति के रूप में मानना सही है?​

  • नहीं, आयकर कानून के उद्देश्य के लिए आप स्व-अधिकृत संपत्ति के रूप में केवल एक ही संपत्ति पर दावा कर सकते हैं और अन्य संपत्ति को किराये पर दी गयी संपत्ति के रूप में माना जायेगा।
  • 24. मैं दो घरों का मालिक हूँ, दोनों घर मेरे और मेरे परिवार के कब्जे में हैं, क्या इसमें कोर्इ भी कर उलझाव उत्पन्न होता है?

  • हां. जैसा कि इसके पहले सवाल के जवाब में कहा गया है कि, गृह संपत्ति से आय केवल एक आवासीय इकार्इ के संबंध में एक काल्पनिक आय है और यदि यह स्व-अधिकृत है तो इस आय को शून्य माना जायेगा। अन्य आवासीय इकार्इ के मामले में, एक उचित किराये को आपकी आय के रूप में मानना होगा और तदनुसार कर लगाया जाएगा।

  • 25. एक स्व-अधिकृत संपत्ति के मामले में, आवास ऋण पर कितने व्याज की कटौती का दावा किया जा सकता है?

  • ​आवास ऋण पर ब्याज के खाते में धारा 24 (ख) के तहत कटौती से संबंधित प्रावधान स्व-अधिकृत संपत्ति के मामले में भी किराए पर दी गयी संपत्ति के मामले की तरह ही लागू होता है। दूसरे शब्दों में, धारा 24 (ख) के तहत करदाता के लिए उपलब्ध कुल कटौती, स्व अधिकृत संपत्ति के मामले में पूर्व निर्माण अवधि (यदि हो तो) से संबंधित ब्याज का 1/5 वां भाग निर्माण अवधि के बाद (यदि हो तो) से संबंधित ब्याज होगा धारा 24 (ख) के प्रावधानों पर पहले ही एक अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न में चर्चा की जा चुकी है।
    हालांकि, स्व-अधिकृत संपत्ति के मामले में धारा 24 (ख)​ के तहत कटौती 2,00,000 रुपये या 30,000 रुपये (जैसा भी मामला हो) से अधिक नहीं हो सकता है। अगर निम्न सभी स्थितियाँ, पूरी हो रही हैं तो उधार पूंजी पर ब्याज के संबंध में सीमा 2,00,000 रुपये होगी:
     ➢  पूंजी 01/04/1999 को या उसके के बाद उधार ली गयी है।
     ➢  पूंजी अधिग्रहण या निर्माण के उद्देश्य के लिए उधार लिया है (अर्थात, मरम्मत, नवीकरण, पुनर्निर्माण के लिए नहीं)।
     ➢  पूंजी जिस वित्तीय वर्ष में उधार ली गयी थी उसके अंत से 3 साल के भीतर अधिग्रहण या निर्माण पूरा हो गया है।
     ➢  जो व्यक्ति ऋण का विस्तार करता है वह प्रमाणित करता है कि संपत्ति के अधिग्रहण या निर्माण के लिए लिये गए पहले के एक ऋण के बकाये के तहत मूल राशि के फिर से वित्त के रूप में या घर के अधिग्रहण या निर्माण के लिए अग्रिम प्राप्त राशि के संबंध में इस तरह का ब्याज देय है।
    अगर ऊपर की शर्तों में से कोर्इ शर्त पूरी नहीं होती तो 2,00,000 रुपये की सीमा 30,000 रुपये तक कम हो जाएगी।

  • 26. एक ऐसी संपत्ति से आय की गणना कैसे की जायेगी जो वर्ष के एक भाग में स्व-अधिकृत हो और वर्ष के दूसरे भाग में किराये पर दी गयी हो?

  • कभी कभी एक संपत्ति वर्ष के दौरान कुछ समय तक किराये पर दी हुयी हो सकती है और शेष अवधि में स्व-अधिकृत हो सकती है। (यानी, किराये पर दी जाने के साथ ही वर्ष के दौरान स्व-अधिकृत हो सकती है)। मद “गृह संपत्ति से आय” के तहत, कर के दायरे में आने वाली आय की गणना के प्रयोजन के लिए ऐसी संपत्ति पूरे वर्ष भर किराये पर दी जाने के रूप में मानी जायेगी और आय की इसी रूप में गणना की जाएगी।
    हालांकि, ऐसी संपत्ति के मामले में, कर योग्य आय की गणना करते समय किराये पर दी गयी अवधि के लिए वास्तविक किराए पर ही विचार किया जाएगा।

  • 27. एक ऐसी संपत्ति से आय की गणना कैसे की जाती है जिसका एक हिस्सा किराये पर दिया गया हो और दूसरा हिस्सा स्व-अधिकृत हो?

  • एक मकान दो या दो से अधिक स्वतंत्र इकाइयों से मिलकर कर बना हो सकता है जिनमें से एक स्व-कब्जे में हो और शेष किसी अन्य उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जा रहा हो (अर्थात- किराये पर दिये जाने या स्वयं के व्यवसाय के लिए इस्तेमाल)। ऐसी संपत्ति से होने वाली आय की निम्नलिखित तरीके से गणना की जाएगी:
    क) भाग / यूनिट जो साल भर अपने निवास के लिए करदाता अपने कब्जे में रखता है एक स्वतंत्र संपत्ति के रूप में माना जाएगा और इस तरह के एक भाग/इकार्इ से आय एक स्व-कब्जे में संपत्ति के मामले में की गयी चर्चा के तरीके से गणना की जाएगी।
    ख) भाग / यूनिट जो किराये पर दी गयी है को एक स्वतंत्र संपत्ति के रूप में माना जाएगा और इस तरह के एक भाग/यूनिट से किराये पर दी गयी संपत्ति के मामले में की गयी चर्चा के तरीके से आय की गणना की जाएगी।

  • 28. अप्राप्त किराए का जो बाद में प्राप्त हो जाता है का कर उपचार क्या है? ​

  • अप्राप्त किराए की बाद में कोर्इ भी वसूली जिस वर्ष में प्राप्त होता है उस वर्ष के लिए “गृह संपत्ति से आय” मद के तहत करदाता की आय होना माना जाएगा। (करदाता चाहे उस वर्ष में उस संपत्ति का मालिक हो या नहीं)।

  • 29. मेरे पास किराए पर दी गयी 5 अलग अलग संपत्तियां हैं। क्या मुझे हर संपत्ति के लिए अलग से गृह संपत्ति आय की गणना करनी चाहिए या सभी प्राप्तियों को एक ही गणना में शामिल कर लिया जाना चाहिए?​

  • ​हर संपत्ति के लिए अलग से गृह संपत्ति से आय की गणना करनी चाहिए।

  • 30. बकाया किराए की राशि का कर उपचार क्या है?

  • ​किराए की बकाया राशि के कारण प्राप्त हुयी राशि (जिसपर पहले कर नहीं वसूला गया है) 30% के बराबर राशि घटाने के बाद ऐसी बकाया राशि पर कर वसूल किया जाएगा। इस राशि पर कर उस वर्ष के लिए वसूला जायेगा जिस वर्ष में यह प्राप्त की जाती है। अगर इस तरह के बकाया के प्राप्त होने के वर्ष में करदाता संपत्ति का मालिक है या नहीं है तब भी यह शुल्क वसूल किया जाता है।

GST: FAQs Series 4

Levy of and Exemption from Tax


Q 1. Where is the power to levy GST derived from?

Ans. Article 246A of the Constitution, which was introduced by the Constitution (101st Amendment) Act, 2016 confers concurrent powers to both, Parliament and State Legislatures to make laws with respect to GST i. e. central tax (CGST) and state tax (SGST) or union territory tax (UTGST).

However, clause 2 of Article 246A read with Article 269A provides exclusive power to the Parliament to legislate with respect to inter-State trade or commerce i.e. integrated tax (IGST).


Q 2. What is the taxable event under GST?

Ans. Taxable event under GST is supply of goods or services or both. CGST and SGST/ UTGST will be levied on intra-State supplies. IGST will be levied on inter-State supplies.

Q 3. Whether supplies made without consideration will also come within the purview of supply under GST?

Ans. Yes, but only those activities which are specified in Schedule I to the CGST Act / SGST Act. The said provision has been adopted in IGST Act as well as in UTGST Act also.


Q 4. Will giving away essential commodities by a charitable institution be taxable activity?

Ans. In order to be a supply which is taxable under GST, the transaction should be in the course or furtherance of business. As there is no quid pro quo involved in supply for charitable activities, it is not a supply under GST.


Q 5. Who can notify a transaction to be supply of goods or services?

Ans. Central Government or State Government, on the recommendations of the GST Council, can notify an activity to be the supply of goods and not supply of services or supply of services and not supply of goods or neither a supply of goods nor a supply of services.


Q 6. What are composite supply and mixed supply? How are these two different from each other?

Ans. Composite supply is a supply consisting of two or more taxable supplies of goods or services or both or any combination thereof, which are bundled in natural course and are supplied in conjunction with each other in the ordinary course of business and where one of which is a principal supply. For example, when a consumer buys a television set and he also gets warranty and a maintenance contract with the TV, this supply is a composite supply. In this example, supply of TV is the principal supply, warranty and maintenance service are ancillary.

Mixed supply is combination of more than one individual supplies of goods or services or any combination thereof made in conjunction with each other for a single price, which can ordinarily be supplied separately. For example, a shopkeeper selling storage water bottles along with refrigerator. Bottles and the refrigerator can easily be priced and sold separately.

Q 7. What is the treatment of composite supply and mixed supply under GST?

Ans. Composite supply shall be treated as supply of the principal supply. Mixed supply would be treated as supply of that particular goods or services which attracts the highest rate of tax.


Q 8. Are all goods and services taxable under GST?

Ans. Supplies of all goods and services are taxable except alcoholic liquor for human consumption. Supply of petroleum crude, high speed diesel, motor spirit (commonly known as petrol), natural gas and aviation turbine fuel shall be taxable with effect from a future date. This date would be notified by the Government on the recommendations of the GST Council.

Q 9. What is meant by Reverse Charge?

Ans. It means the liability to pay tax is on the recipient of supply of goods and services instead of the supplier of such goods or services in respect of notified categories of supply.

Q 10. Is the reverse charge mechanism applicable only to services?

Ans. No, reverse charge applies to supplies of both goods and services, as notified by the Government on the recommendations of the GST Council.

Disclaimer:

This FAQ on GST compiled by NACEN and vetted by the Source Trainers is based on the CGST/SGST/UTGST/IGSTAct(s). This FAQ is for training and academic purposes only.

The information in this blogger is reproduced from FAQ on GST publised by CBEC updated on 31 March 2017 and is not intended to be treated as legal ad vice or opinion. For greater details, you are requested to refer to the respective CGST/SGST/UTGST/IGST Acts.

The FAQs refer to CGST and SGST Acts as CGST/SGST as CGST Act and SGST Act are identical in most of the provisions. CGST Act has been introduced in the Parliament. The SGST Acts will be passed by respective state legislatures. A few provisions may be specific to state and may not be in CGST Act.

Astavakra Gita…. Special instruction

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Ashtavakra said:

16.7

As long as there is desire–
which is the absence of discrimination–
there will be attachment and non-attachment.
This is the cause of the world.

16.8

Indulgence creates attachment.
Aversion creates abstinence.
Like a child, the sage is free of both
and thus lives on as a child.

16.9

One who is attached to the world
thinks renouncing it will relieve his misery.
One who is attached to nothing is free
and does not feel miserable
even in the world.





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You are welcome for discussion Sunday 4 pm to 7pm, Friday 9 pm to 10 pm.(Mob. 9560084833)

Astavakra Gita…. Special instruction


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Ashtavakra said:

16.4

The master idler,
to whom even blinking is a bother,
is happy.
But he is the only one.

16.5

When the mind is free of opposites
like “This is done,” and “This is yet undone,”
one becomes indifferent to
merit, wealth, pleasure and liberation.

16.6

One who abhors sense objects avoids them.
One who desires them becomes ensnared.
One who neither abhors nor desires
is neither detached nor attached.




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Ashtavakra said:

16.1

You can recite and discuss scripture
all you want,
but until you drop everything
you will never know Truth.

16.2

You can enjoy and work and meditate,
but you will still yearn for That
which is beyond all experience,
and in which all desires are extinguished.

16.3

Everyone is miserable
because they exert constant effort.
But no one understands this.
A ripe mind can become unshackled

upon hearing this one instruction.




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