Bhagavad-gita: The Universal Form, Text 32 to 46, Chapter 11



श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥

śrī bhagavānuvāca
kālō.smi lōkakṣayakṛtpravṛddhō
lōkānsamāhartumiha pravṛttaḥ.
ṛtē.pi tvāṅ na bhaviṣyanti sarvē
yē.vasthitāḥ pratyanīkēṣu yōdhāḥ৷৷11.32৷৷

भावार्थ : श्री भगवान बोले- मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। इसलिए जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जाएगा॥32॥

तस्मात्त्वमुक्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्‍क्ष्व राज्यं समृद्धम्‌ ।

मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्‌ ॥

tasmāttvamuttiṣṭha yaśō labhasva
jitvā śatrūn bhuṅkṣva rājyaṅ samṛddham.
mayaivaitē nihatāḥ pūrvamēva
nimittamātraṅ bhava savyasācin৷৷11.33৷৷

भावार्थ : अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन! (बाएँ हाथ से भी बाण चलाने का अभ्यास होने से अर्जुन का नाम ‘सव्यसाची’ हुआ था) तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा॥33॥

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्‌ ।

मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठायुध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्‌ ॥
drōṇaṅ ca bhīṣmaṅ ca jayadrathaṅ ca
karṇaṅ tathā.nyānapi yōdhavīrān.
mayā hatāṅstvaṅ jahi mā vyathiṣṭhā
yudhyasva jētāsi raṇē sapatnān৷৷11.34৷৷

भावार्थ : द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार। भय मत कर। निःसंदेह तू युद्ध में वैरियों को जीतेगा। इसलिए युद्ध कर॥34॥

भयभीत हुए अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति और चतुर्भुज रूप का दर्शन कराने के लिए प्रार्थना


संजय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृतांजलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णंसगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥
sañjaya uvāca
ētacchrutvā vacanaṅ kēśavasya
kṛtāñjalirvēpamānaḥ kirīṭī.
namaskṛtvā bhūya ēvāha kṛṣṇaṅ
sagadgadaṅ bhītabhītaḥ praṇamya৷৷11.35৷৷
भावार्थ : संजय बोले- केशव भगवान के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपते हुए नमस्कार करके, फिर भी अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गद्‍गद्‍ वाणी से बोले॥35॥

अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्‍घा: ॥
arjuna uvāca
sthānē hṛṣīkēśa tava prakīrtyā
jagat prahṛṣyatyanurajyatē ca.
rakṣāṅsi bhītāni diśō dravanti
sarvē namasyanti ca siddhasaṅghāḥ৷৷11.36৷৷
भावार्थ : अर्जुन बोले- हे अन्तर्यामिन्! यह योग्य ही है कि आपके नाम, गुण और प्रभाव के कीर्तन से जगत अति हर्षित हो रहा है और अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षस लोग दिशाओं में भाग रहे हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार कर रहे हैं॥36॥

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे।

अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌ ॥
kasmācca tē na namēranmahātman
garīyasē brahmaṇō.pyādikartrē.
ananta dēvēśa jagannivāsa
tvamakṣaraṅ sadasattatparaṅ yat৷৷11.37৷৷
भावार्थ : हे महात्मन्‌! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्‌, असत्‌ और उनसे परे अक्षर अर्थात सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही हैं॥37॥

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌ ।

वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप । ।
tvamādidēvaḥ puruṣaḥ purāṇa-
stvamasya viśvasya paraṅ nidhānam.
vēttāsi vēdyaṅ ca paraṅ ca dhāma
tvayā tataṅ viśvamanantarūpa৷৷11.38৷৷
भावार्थ : आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इन जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात परिपूर्ण हैं॥38॥

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्‍क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।

नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥
vāyuryamō.gnirvaruṇaḥ śaśāṅkaḥ
prajāpatistvaṅ prapitāmahaśca.
namō namastē.stu sahasrakṛtvaḥ
punaśca bhūyō.pi namō namastē৷৷11.39৷৷
भावार्थ : आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपके लिए हजारों बार नमस्कार! नमस्कार हो!! आपके लिए फिर भी बार-बार नमस्कार! नमस्कार!!॥39॥

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व। 

अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥
namaḥ purastādatha pṛṣṭhatastē
namō.stu tē sarvata ēva sarva.
anantavīryāmitavikramastvaṅ
sarvaṅ samāpnōṣi tatō.si sarvaḥ৷৷11.40৷৷
भावार्थ : हे अनन्त सामर्थ्यवाले! आपके लिए आगे से और पीछे से भी नमस्कार! हे सर्वात्मन्‌! आपके लिए सब ओर से ही नमस्कार हो, क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किए हुए हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं॥40॥

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।

अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्‌ ॥
sakhēti matvā prasabhaṅ yaduktaṅ
hē kṛṣṇa hē yādava hē sakhēti.
ajānatā mahimānaṅ tavēdaṅ
mayā pramādātpraṇayēna vāpi৷৷11.41৷৷
yaccāvahāsārthamasatkṛtō.si
vihāraśayyāsanabhōjanēṣu.
ēkō.thavāpyacyuta tatsamakṣaṅ
tatkṣāmayē tvāmahamapramēyam৷৷11.42৷৷
भावार्थ : आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने ‘हे कृष्ण!’, ‘हे यादव !’ ‘हे सखे!’ इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात्‌ कहा है और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिए विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किए गए हैं- वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्थात अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ॥41-42॥

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्‌।

न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्योलोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥
pitāsi lōkasya carācarasya
tvamasya pūjyaśca gururgarīyān.
na tvatsamō.styabhyadhikaḥ kutō.nyō
lōkatrayē.pyapratimaprabhāva৷৷11.43৷৷
भावार्थ : आप इस चराचर जगत के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय हैं। हे अनुपम प्रभाववाले! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं हैं, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है॥43॥

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायंप्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्‌।

पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्‌॥
tasmātpraṇamya praṇidhāya kāyaṅ
prasādayē tvāmahamīśamīḍyam.
pitēva putrasya sakhēva sakhyuḥ
priyaḥ priyāyārhasi dēva sōḍhum৷৷11.44৷৷
भावार्थ : अतएव हे प्रभो! मैं शरीर को भलीभाँति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिए प्रार्थना करता हूँ। हे देव! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते हैं- वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य हैं। ॥44॥

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।


तदेव मे दर्शय देवरूपंप्रसीद देवेश जगन्निवास ॥


adṛṣṭapūrvaṅ hṛṣitō.smi dṛṣṭvā
bhayēna ca pravyathitaṅ manō mē.
tadēva mē darśaya dēva rūpaṅ
prasīda dēvēśa jagannivāsa৷৷11.45৷৷


भावार्थ : मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुझे दिखलाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए॥45॥

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव।

तेनैव रूपेण चतुर्भुजेनसहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥
kirīṭinaṅ gadinaṅ cakrahasta-
micchāmi tvāṅ draṣṭumahaṅ tathaiva.
tēnaiva rūpēṇa caturbhujēna 
sahasrabāhō bhava viśvamūrtē৷৷11.46৷৷
भावार्थ : मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किए हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ। इसलिए हे विश्वस्वरूप! हे सहस्रबाहो! आप उसी चतुर्भुज रूप से प्रकट होइए॥46॥

Published by Business So Simple

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