Hindi poem

सजग सबल मातृस्नेह की
सुधामयी परिभाषा हैं जो….
अबोध शिशु सम शिष्यों के हृदय की
चिर अभिलाषा हैं जो…
सरल सहज सारभूत सुषमा की
रहस्यमयी स्वामिनी हैं जो….
निखिलधाम मे मुखरित मुकुलित…
अंगीभूता दिव्य दामिनी हैं जो…
प्रवाहमयी प्रचंडा नर्मदा की
अनन्त लहरों में व्याप्त
जल-विद्युत का
अभंग तरंगित प्राण -प्रकाश हैं जो
अखंड प्रचंड रहस्यमय तप -निरत
अहर्निश आकंठ मगन मीरा की
अनुपम प्रीत का आकाश हैं जो…
निज दीक्षित संतानों के हित
पतझड़ विहीन नित नवीन
ममत्व का मधुमास हैं जो…..
ऐश्वर्य और माधुर्य के सौंदर्य की
मधुरतम सुवास हैं जो…
भुवनेश्वरी ब्रह्मांड नायिका त्रिशक्ति स्वरुपिणी..
हमारी नेहमयी गुरु मां की जन्मतिथि की
सुनहरी भोर और रुपहली रजनी
साक्षी स्वरुपिणी …
प्यारी सी गुरूमां के श्री चरणों में अर्पण..
सादर अभिनन्दन ….
शत् शत् वंदन… (Written by Prabha Gupta my spiritual mother)

Leave a comment